महाराष्ट्र मुख्यमंत्री फडणवीस का बड़ा ऐलान, मराठी रहेगी अनिवार्य, हिंदी वैकल्पिक

मुंबई | 29 जून, 2025 –
महाराष्ट्र सरकार ने हिंदी भाषा अनिवार्यता के दोनों सरकारी फैसले आखिरकार रद्द कर दिए हैं, जो राज्य में विवादित हो गए थे। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यह बड़ा ऐलान करते हुए स्पष्ट किया कि, “मराठी महाराष्ट्र की मुख्य भाषा बनी रहेगी और कोई अन्य भाषा अनिवार्य नहीं की जाएगी।”
📜 यह जीआर कौन सा था?
▪️ 16 अप्रैल, 2025 को पहला जीआर:
कक्षा 1 से राज्य के स्कूलों में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी भाषा को अनिवार्य करने का फैसला।
▪️ 17 जून, 2025 को संशोधित जीआर:
हालांकि यह कहा गया था कि हिंदी वैकल्पिक है, लेकिन इसका असर यह हुआ कि अधिकांश मराठी स्कूलों में हिंदी अपने आप लागू हो जाएगी।
इन दोनों फैसलों पर लोगों में भारी आक्रोश था।
🔥 बढ़ता विरोध और आंदोलन की तैयारी
मराठी भाषा संग्राम परिषद, मनसे, शिवसेना (उद्धव समूह), साहित्यिक संगठन और कई शिक्षकों और विद्वानों ने इन फैसलों का कड़ा विरोध किया।
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने 5 जुलाई को संयुक्त मार्च का आह्वान किया था। यह मार्च मुंबई में बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाना था।
राजनीतिक रूप से यह घटना बहुत महत्वपूर्ण हो गई। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने मार्च से पहले ही जीआर वापस ले लिया।
🧾 सरकार का रुख- “हमने इसे वापस ले लिया है, लेकिन अध्ययन समिति ही इस पर फैसला लेगी”
“मराठी भाषा बरकरार रहेगी”- फडणवीस
फडणवीस ने कहा, “मराठी हमारी पहचान की भाषा है। राज्य सरकार इसके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। हिंदी या अन्य भाषाओं का सम्मान है, लेकिन किसी पर भी भाषा थोपी नहीं जाएगी। हिंदी थोपना हमारा उद्देश्य नहीं था। हम विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि त्रिभाषा फॉर्मूला सही तरीके से लागू हो”
🗣️ महाराष्ट्र के लोगों की प्रतिक्रिया
सरकार के इस फैसले का मराठी समुदाय स्वागत कर रहा है। सोशल मीडिया पर “मराठी विजय”, “हिंदी अनिवार्यता का विरोध” जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
मराठी भाषा अभियान के कार्यकर्ताओं का कहना है,
“यह सिर्फ एक लड़ाई थी, पूरी जीत तभी मिलेगी, जब त्रिभाषा नीति से हिंदी का दबाव पूरी तरह से हट जाएगा।”
त्रिभाषा नीति से मचा बवाल
महाराष्ट्र सरकार ने अप्रैल में एक जीआर जारी कर राज्य के सभी स्कूलों में कक्षा 1 से हिंदी पढ़ाना अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद जून में एक और जीआर जारी कर त्रिभाषा नीति में हिंदी को वैकल्पिक तो बनाया लेकिन हिंदी को फिर से प्राथमिकता देते हुए इसे “डिफ़ॉल्ट” विकल्प बना दिया।
इन दोनों ही फैसलों का मराठी भाषी समुदाय, साहित्यकार, कलाकार, शिक्षाविद, विपक्षी दल और सामाजिक संगठनों ने कड़ा विरोध किया था। मराठी भाषा संग्राम समिति, मनसे, शिवसेना (उद्धव समूह) के साथ-साथ कई प्रबुद्ध नागरिकों ने इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की तैयारी शुरू कर दी थी।
5 जुलाई के मार्च की पृष्ठभूमि में निर्णायक फैसला
राज ठाकरे के नेतृत्व में मनसे ने 5 जुलाई को महामार्च निकालने का ऐलान किया था। वहीं, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) समूह ने भी अलग मोर्चा बनाने का ऐलान किया था। हालांकि, मराठी के लिए दोनों भाइयों के एक साथ आने से सरकार पर काफी दबाव था।
इस पृष्ठभूमि में किसी भी तरह के टकराव से बचने और राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में सर्वसम्मति से दोनों जीआर को रद्द करने का फैसला लिया गया।
डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में समिति गठित
सरकार ने अब त्रिभाषा नीति को लागू करने और भाषा नीति पर गहन अध्ययन करने के लिए डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है।
यह समिति सभी भाषाई समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए सिफारिशें करेगी। इन सिफारिशों के आधार पर अगली नीति तय की जाएगी।
विपक्ष में खुशी, लेकिन सावधानी भी
राज ठाकरे ने ट्विटर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह पहली जीत है, अंतिम नहीं। हमें भविष्य में सरकार पर नज़र रखनी होगी।”
उद्धव ठाकरे ने कहा, “सरकार पीछे हट गई है, इसका मतलब है कि लोगों की आवाज़ महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन अब से कोई भी मराठी विरोधी कदम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
लोगों की राय – “यह हमारी जीत है!”
आम अभिभावकों, शिक्षकों, विद्वानों, विद्यार्थियों और नागरिकों में संतोष की भावना है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर “मराठी विजय”, “#हिंदी सत्ता निरस्त” जैसे हैशटैग के माध्यम से अपनी खुशी व्यक्त की।
अगला कदम क्या है?
स्थिति में, दोनों सरकारी निर्णय पूरी तरह से निरस्त हैं। मराठी भाषा मुख्य भाषा के रूप में अनिवार्य है। हिंदी भाषा वैकल्पिक है, कोई बाध्यता नहीं है। डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में समिति कार्यरत होगी। 5 जुलाई मोर्चा। अभी भी अनिश्चित, लेकिन वापस लेना संभव है।
यह घटना केवल मराठी भाषा के मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन आंदोलन, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक चेतना का संगम बन गई है। महाराष्ट्र के लोगों द्वारा दिखाई गई एकता और जागरूकता ने सरकार को निर्णय वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया। समग्र जनभावना से यह स्पष्ट है कि मराठी भाषा से प्रेम करने वाले लोगों की भावनाओं को कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। पहली नज़र में ऐसा लगता है।